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Thursday, February 20, 2020
Saturday, April 6, 2013
हो गई है पीर पर्वत-सी
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
Saturday, December 1, 2012
आधुनिक देश प्रेम
देश छोड़ अंग्रेज़ गए, बदली नारों की भाषा,
समय हैं बदला, साथ में बदली देश प्रेम की परिभाषा,
ड्राइंग रूम में बैठ के जब भी, खाया गरम समोसा है.
और देख कर टी.वी. बात-बात पर नेताओं को कोसा हैं,
वहीँ काश्मीर, वहीँ घोटाले, ये समाचार नए थे क्या,
नेता तो हम खुद चुनते हैं, वोट डालने गए थे क्या,
प्रदुषण से भरे शहर में तुमने बच्चे पाले हैं,
समय हैं बदला, साथ में बदली देश प्रेम की परिभाषा,
ड्राइंग रूम में बैठ के जब भी, खाया गरम समोसा है.
और देख कर टी.वी. बात-बात पर नेताओं को कोसा हैं,
वहीँ काश्मीर, वहीँ घोटाले, ये समाचार नए थे क्या,
नेता तो हम खुद चुनते हैं, वोट डालने गए थे क्या,
प्रदुषण से भरे शहर में तुमने बच्चे पाले हैं,
पेड़ लगाया तुमने कोई, क्यों सबके मुंह पर ताले हैं,
पेड़ लगाना क्या केवल सरकारी जिम्मेदारी हों,
हरियाली के महायज्ञ में, सबकी भागीदारी हो,
जनसंख्या विस्फोट देश की सबसे बड़ी परेशानी,
संसाधन कम पड़ने पर, क्यूँ करती जनता हैरानी,
परिवार नियोजन के नारे की, मिलकर बोलो जय-जयकार,
एक हो प्यारा घर में बच्चा, पेड़ लगे हो एक हजार,
अनपढ़ता के अंधियारे को, मिल कर हमें भगाना हैं,
आस-पास किसी अनपढ़ को, पढने को उकसाना हैं,
कलम हाथ में उसे थमा कर, थोडा-थोडा उसे पढ़ाते जाओ,
अपने ज्ञान के बड़े बल्ब से, उसका दिया जलाते जाओ,
घर में व्यर्थ जले ने बिजली, आओ ऐसा प्रबंध करे,
बच्चे बूढ़े आदत डाले, बहते नल को बंद करे,
ऑफिस का काम करो मन से, न टालो जब तक टलता है.
याद रहे की इसी काम से, घर का चूल्हा जलता हैं,
आज देश को नहीं जरुरत, फांसी पर चढ़ जाने की,
देश भक्ति की यहीं हैं सूरत, नए ज़माने की,
अधिकार और कर्तव्य का ज्ञान हो सबको, न कोई कमजोर और बेचारा हो -2
पेड़ लगाना क्या केवल सरकारी जिम्मेदारी हों,
हरियाली के महायज्ञ में, सबकी भागीदारी हो,
जनसंख्या विस्फोट देश की सबसे बड़ी परेशानी,
संसाधन कम पड़ने पर, क्यूँ करती जनता हैरानी,
परिवार नियोजन के नारे की, मिलकर बोलो जय-जयकार,
एक हो प्यारा घर में बच्चा, पेड़ लगे हो एक हजार,
अनपढ़ता के अंधियारे को, मिल कर हमें भगाना हैं,
आस-पास किसी अनपढ़ को, पढने को उकसाना हैं,
कलम हाथ में उसे थमा कर, थोडा-थोडा उसे पढ़ाते जाओ,
अपने ज्ञान के बड़े बल्ब से, उसका दिया जलाते जाओ,
घर में व्यर्थ जले ने बिजली, आओ ऐसा प्रबंध करे,
बच्चे बूढ़े आदत डाले, बहते नल को बंद करे,
ऑफिस का काम करो मन से, न टालो जब तक टलता है.
याद रहे की इसी काम से, घर का चूल्हा जलता हैं,
आज देश को नहीं जरुरत, फांसी पर चढ़ जाने की,
देश भक्ति की यहीं हैं सूरत, नए ज़माने की,
अधिकार और कर्तव्य का ज्ञान हो सबको, न कोई कमजोर और बेचारा हो -2
जनहित में जब कदम बढे तो, पहला कदम हमारा हो।- 3
Thursday, May 26, 2011
पूज्य योगगुरु स्वामी रामदेव जी
पूज्य योगगुरु स्वामी रामदेव जी के प्रति समर्पण
पू -रब को जानो पश्चिम का मत अँधा -अनुकरण करो,
ज -योति योग की पुनापर्जुवालित हुई इसी का वरन करो.
य -ह युग -युगान्तरो का मेला विलय संधि कि बेला ह,
यो -ग ही नहीं "सोलह कला" सिखाता वो अलबेला है .
ग -हराइ सागर सी जिसका है उत्कर्ष हिमालय सा,
गु -नजाए जब मंत्र समूचा देश लगे देवालय सा .
रु -के न खुद जन - पथ से सारे अवरोध हटाये हैं,
स् -वस्त्य रहे तन - मन सबके ऐसे सूत्र बताये हैं.
वा -नि में है ओज हरदया में सबके हिय के ताप लिए,
मी -त बना सब जग को जन - जन के संताप लिए.
रा -सट - धर्म सर्वोच्च बताया अपने शुभ संदेशो मैं,
म -हिमा गई कर्म - योग की दुनिया भर के देशो मैं.
दे -ने स्वस्थ्य चले प्राणायाम का महा - अभियान चलाया,
व -ह जब चले जाग्रति को सारा हिंदुस्तान जगाया.
जी -ना हमको सिखा रहे है महापुर्शो के आदर्श लिए,
सुमन यही विनती पराभू से स्वामी जी सहस्रों वर्ष जिए.
कवि सुमनेश सुमन
आत्मज - महाकवि पंडित ताराचंद हारित
०१२१- २५७७७८५ , 099970911719
पू -रब को जानो पश्चिम का मत अँधा -अनुकरण करो,
ज -योति योग की पुनापर्जुवालित हुई इसी का वरन करो.
य -ह युग -युगान्तरो का मेला विलय संधि कि बेला ह,
यो -ग ही नहीं "सोलह कला" सिखाता वो अलबेला है .
ग -हराइ सागर सी जिसका है उत्कर्ष हिमालय सा,
गु -नजाए जब मंत्र समूचा देश लगे देवालय सा .
रु -के न खुद जन - पथ से सारे अवरोध हटाये हैं,
स् -वस्त्य रहे तन - मन सबके ऐसे सूत्र बताये हैं.
वा -नि में है ओज हरदया में सबके हिय के ताप लिए,
मी -त बना सब जग को जन - जन के संताप लिए.
रा -सट - धर्म सर्वोच्च बताया अपने शुभ संदेशो मैं,
म -हिमा गई कर्म - योग की दुनिया भर के देशो मैं.
दे -ने स्वस्थ्य चले प्राणायाम का महा - अभियान चलाया,
व -ह जब चले जाग्रति को सारा हिंदुस्तान जगाया.
जी -ना हमको सिखा रहे है महापुर्शो के आदर्श लिए,
सुमन यही विनती पराभू से स्वामी जी सहस्रों वर्ष जिए.
कवि सुमनेश सुमन
आत्मज - महाकवि पंडित ताराचंद हारित
०१२१- २५७७७८५ , 099970911719
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