Showing posts with label ravindersanjay. Show all posts
Showing posts with label ravindersanjay. Show all posts

Thursday, February 20, 2020

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर.
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसि के दिल में है.
दिल में तूफ़ानों कि टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
--राम प्रसाद बिस्मिल 

Saturday, April 6, 2013

हो गई है पीर पर्वत-सी

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

http://www.hindisamay.com/kavita/Dushyant%20kumar.htm#हो गई है पीर पर्वत-सी

Saturday, December 1, 2012

आधुनिक देश प्रेम

देश छोड़ अंग्रेज़ गए, बदली नारों की भाषा,
समय हैं बदला, साथ में बदली देश प्रेम की परिभाषा,

ड्राइंग रूम में बैठ के जब भी, खाया गरम समोसा है.
और देख कर टी.वी. बात-बात पर नेताओं को कोसा हैं,

वहीँ काश्मीर, वहीँ घोटाले, ये समाचार नए थे क्या,
नेता तो हम खुद चुनते हैं, वोट डालने गए थे क्या,

प्रदुषण से भरे शहर में तुमने
बच्चे पाले हैं,
पेड़ लगाया तुमने कोई, क्यों सबके मुंह पर ताले हैं,

पेड़ लगाना क्या केवल सरकारी जिम्मेदारी हों,
हरियाली के महायज्ञ में, सबकी भागीदारी हो,

जनसंख्या विस्फोट देश की सबसे बड़ी परेशानी,
संसाधन कम पड़ने पर, क्यूँ करती जनता हैरानी,

परिवार नियोजन के नारे की, मिलकर बोलो जय-जयकार,
एक हो प्यारा घर में बच्चा, पेड़ लगे हो एक हजार,

अनपढ़ता के अंधियारे को, मिल कर हमें भगाना हैं,
आस-पास किसी अनपढ़ को, पढने को उकसाना हैं,

कलम हाथ में उसे थमा कर, थोडा-थोडा उसे पढ़ाते जाओ,
अपने ज्ञान के बड़े बल्ब से, उसका दिया जलाते जाओ,

घर में व्यर्थ जले ने बिजली, आओ ऐसा प्रबंध करे,
बच्चे बूढ़े आदत डाले, बहते नल को बंद करे,

ऑफिस का काम करो मन से, न टालो जब तक टलता है.
याद रहे की इसी काम से, घर का चूल्हा जलता हैं,

आज देश को नहीं जरुरत, फांसी पर चढ़ जाने की,
देश भक्ति की यहीं हैं सूरत, नए ज़माने की,

अधिकार और कर्तव्य का ज्ञान हो सबको, न कोई कमजोर और बेचारा हो -2
 जनहित में जब कदम बढे तो, पहला कदम हमारा हो।- 3



Thursday, May 26, 2011

पूज्य योगगुरु स्वामी रामदेव जी

पूज्य योगगुरु स्वामी रामदेव जी के प्रति समर्पण

पू -रब को जानो पश्चिम का मत अँधा -अनुकरण करो,
ज -योति योग की पुनापर्जुवालित हुई इसी का वरन करो.
य -ह युग -युगान्तरो का मेला विलय संधि कि बेला ह,
यो -ग ही नहीं "सोलह कला" सिखाता वो अलबेला है .
ग -हराइ सागर सी जिसका है उत्कर्ष हिमालय सा,
गु -नजाए जब मंत्र समूचा देश लगे देवालय सा .
रु -के न खुद जन - पथ से सारे अवरोध हटाये हैं,
स् -वस्त्य रहे तन - मन सबके ऐसे सूत्र बताये हैं.
वा -नि में है ओज हरदया में सबके हिय के ताप लिए,
मी -त बना सब जग को जन - जन के संताप लिए.
रा -सट - धर्म सर्वोच्च बताया अपने शुभ संदेशो मैं,
म -हिमा गई कर्म - योग की दुनिया भर के देशो मैं.
दे -ने स्वस्थ्य चले प्राणायाम का महा - अभियान चलाया,
व -ह जब चले जाग्रति को सारा हिंदुस्तान जगाया.
जी -ना हमको सिखा रहे है महापुर्शो के आदर्श लिए,
सुमन यही विनती पराभू से स्वामी जी सहस्रों वर्ष जिए.

कवि सुमनेश सुमन
आत्मज - महाकवि पंडित ताराचंद हारित
०१२१- २५७७७८५ , 099970911719