Friday, May 20, 2016

वन्दे मातरम् ( Hindi meaning )


1.
वन्दे मातरम्!
सुजलां सुफलां मलयजशीतलां
शस्यश्यामलां मातरम्!

2.
शुभ-ज्योत्सना-पुलकित-यामिनीम्
फुल्ल-कुसुमित-द्रमुदल शोभिनीम्
सुहासिनी सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्!

3.
सन्तकोटिकंठ-कलकल-निनादकराले
द्विसप्तकोटि भुजैर्धृतखरकरबाले
अबला केनो माँ एतो बले।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदल वारिणीं मातरम्!

4.
तुमि विद्या तुमि धर्म
तुमि हरि तुमि कर्म
त्वम् हि प्राणाः शरीरे।
बाहुते तुमि मा शक्ति
हृदये तुमि मा भक्ति
तोमारइ प्रतिमा गड़ि मंदिरें-मंदिरे।

5.
त्वं हि दूर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमल-दल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी नवामि त्वां
नवामि कमलाम् अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्!
वन्दे मातरम्!

6.
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीम् मातरम्।
(साभारः आनन्द मठ् पृ0 60, राजकमल प्रकाशन,संस्करण तृतीय, 1997)

अनुवाद
1.
हे माँ मैं तेरी वन्दना करता हूँ
तेरे अच्छे पानी, अच्छे फलों,
सुगन्धित, शुष्क, उत्तरी समीर (हवा)
हरे-भरे खेतों वाली मेरी माँ।
2.
सुन्दर चाँदनी से प्रकाशित रात वाली,
खिले हुए फूलों और घने वृ़क्षों वाली,
सुमधुर भाषा वाली,
सुख देने वाली वरदायिनी मेरी माँ।
3.
तीस करोड़ कण्ठों की जोशीली आवाज़ें,
साठ करोड़ भुजाओं में तलवारों को
धारण किये हुए
क्या इतनी शक्ति के बाद भी,
हे माँ तू निर्बल है,
तू ही हमारी भुजाओं की शक्ति है,
मैं तेरी पद-वन्दना करता हूँ मेरी माँ।
4.
तू ही मेरा ज्ञान, तू ही मेरा धर्म है,
तू ही मेरा अन्तर्मन, तू ही मेरा लक्ष्य,
तू ही मेरे शरीर का प्राण,
तू ही भुजाओं की शक्ति है,
मन के भीतर तेरा ही सत्य है,
तेरी ही मन मोहिनी मूर्ति
एक-एक मन्दिर में,
5.
तू ही दुर्गा दश सशस्त्र भुजाओं वाली,
तू ही कमला है, कमल के फूलों की बहार,
तू ही ज्ञान गंगा है, परिपूर्ण करने वाली,
मैं तेरा दास हूँ, दासों का भी दास,
दासों के दास का भी दास,
अच्छे पानी अच्छे फलों वाली मेरी माँ,
मैं तेरी वन्दना करता हूँ।
6.
लहलहाते खेतों वाली, पवित्र, मोहिनी,
सुशोभित, शक्तिशालिनी, अजर-अमर
मैं तेरी वन्दना करता हूँ।

Saturday, April 6, 2013

हो गई है पीर पर्वत-सी

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

http://www.hindisamay.com/kavita/Dushyant%20kumar.htm#हो गई है पीर पर्वत-सी

Saturday, March 23, 2013

पप्पू झांसेबाज

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पप्पू झांसेबाज


झांसे में किसी के, वो आता नहीं था
वो पप्पू ही था, जो नहाता नहीं था

पापा भी समझाते, समझाते हारे
दोस्तों ने ताने भी, जी भर के मारे

हमेशा बच निकलता, वो टकराता नहीं था
वो पप्पू ही था, जो नहाता नहीं था

एक दिन गब्बर भी बोल, करके ठिठोली -
बता कब है होली, बता कब है होली

होली के दिन हुआ, जब बिलकुल सवेरा
सुबह ही सुबह , सबने पप्पू को घेरा

बड़े दिन हुए , तुमको बचते बचाते
कहो क्या है कारण, नहीं क्यों नहाते

पानी की टंकी में, कई रंगों को मिलाएं
आओ चल के पप्पू को , इसमें डुबायें

बिगड़ गया पप्पू , दोनों हाथों को जोड़ा
कैसे लोग हो तुम , शर्म करो थोडा

पानी की किल्लत है , रास्ट्र सुखा पड़ा है
तुम्हे चाव होली का, फिर भी पड़ा है

हजारों गाँव में , भयंकर है सुखा
हमारा अन्नदाता , किसान खुद ही है भूखा

हमेशा ही करते हो, क्रिकेट की बातें
क्रिकेट के स्कोरों को , ओढें या चाटें

आओ चर्चा करें, कैसे पानी बचाएं -
समझें पानी की कीमत, और सबकों बताएं

बात सुन पप्पू की, अपनी हिम्मत थी टूटी
पर ट्रिक एक लगाई , हमने बिलकुल अनूठी

बोले पानी को छोड़ो , हम से रंग तो लगवाओ
बहुत दिनों से बचे, होली पर तो नहाओ

बात रंगों की सुन, पप्पू था जोश में
जो सोचा कभी , कह गया होश में

बस एक रंग ही , मुझको प्यारा लगे
सारे रंगों से मुझको , वो न्यारा लगे

ये रंग है निराला, जो दिखता नहीं
किसी बाजार में भी, ये बिकता नहीं

अगर है वो ही रंग तो लगा दो मुझे
रंग "बसंती" से चाहे , नहा दो मुझे

रंग बसंती लगा, जब भगत सिंह चला
देश के दुश्मनों, का था सुखा गला

रंग बसंती, शिवाजी की पहचान है
ये उसी को चढ़ा, जिसमें स्वाभिमान है

सुन के बातें बड़ी, दोस्त हैरान थें
पप्पू फिर बच गया , वो परेशान थे

क्योंकि गीत देश प्रेम का , उनको आता नहीं था
वो पप्पू ही था, जो नहाता नहीं था
झांसे में किसी के, वो आता नहीं था



दिनांक - 23 मार्च 2013
रचनाकार- रविंदर कुमार 
डायरेक्टर-  "माँ सरस्वती देवी जी "
स्पोंसर -  "बाबा राम देव जी "

Sunday, December 2, 2012

महर्षि दयानन्द सरस्वती के अवतार स्वामी राम देव जी का महान चरित्र देखें

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के अवतार स्वामी राम देव जी का महान चरित्र देखें

कोई प्रभु-भक्त है तो विद्वान् नहीं,
कोई विद्वान् है तो योगी नहीं,
कोई योगी है तो सुधारक नहीं,
कोई सुधारक है तो दिलेर नहीं,
कोई दिलेर है तो ब्रह्मचारी नहीं,
कोई ब्रह्मचारी है तो वक्ता नहीं,
कोई वक्ता है तो लेखक नहीं,
कोई लेखक है तो सदाचारी नहीं,

कोई सदाचारी है तो परोपकारी नहीं,
कोई परोपकारी है तो कर्मठ नहीं,
कोई कर्मठ है तो त्यागी नहीं,
कोई त्यागी है तो देशभक्त नहीं,
कोई देशभक्त है तो वेदभक्त नहीं,
कोई वेदभक्त है तो उदार नहीं,
कोई उदार है तो शुद्धाहारी नहीं,
कोई शुद्धाहारी है तो योद्धा नहीं,
कोई योद्धा है तो सरल नहीं,
कोई सरल है तो सुन्दर नहीं,
कोई सुन्दर है तो बलिष्ठ नहीं,
कोई बलिष्ठ है तो दयालु नहीं,
कोई दयालु है तो संयमी नहीं ।

परंतु यदि आप ये सभी गुण एक ही स्थान पर देखना चाहें तो महर्षि दयानन्द के अवतार स्वामी राम देव जी को देखो - निष्पक्ष होकर देखो ।

Saturday, December 1, 2012

आधुनिक देश प्रेम

देश छोड़ अंग्रेज़ गए, बदली नारों की भाषा,
समय हैं बदला, साथ में बदली देश प्रेम की परिभाषा,

ड्राइंग रूम में बैठ के जब भी, खाया गरम समोसा है.
और देख कर टी.वी. बात-बात पर नेताओं को कोसा हैं,

वहीँ काश्मीर, वहीँ घोटाले, ये समाचार नए थे क्या,
नेता तो हम खुद चुनते हैं, वोट डालने गए थे क्या,

प्रदुषण से भरे शहर में तुमने
बच्चे पाले हैं,
पेड़ लगाया तुमने कोई, क्यों सबके मुंह पर ताले हैं,

पेड़ लगाना क्या केवल सरकारी जिम्मेदारी हों,
हरियाली के महायज्ञ में, सबकी भागीदारी हो,

जनसंख्या विस्फोट देश की सबसे बड़ी परेशानी,
संसाधन कम पड़ने पर, क्यूँ करती जनता हैरानी,

परिवार नियोजन के नारे की, मिलकर बोलो जय-जयकार,
एक हो प्यारा घर में बच्चा, पेड़ लगे हो एक हजार,

अनपढ़ता के अंधियारे को, मिल कर हमें भगाना हैं,
आस-पास किसी अनपढ़ को, पढने को उकसाना हैं,

कलम हाथ में उसे थमा कर, थोडा-थोडा उसे पढ़ाते जाओ,
अपने ज्ञान के बड़े बल्ब से, उसका दिया जलाते जाओ,

घर में व्यर्थ जले ने बिजली, आओ ऐसा प्रबंध करे,
बच्चे बूढ़े आदत डाले, बहते नल को बंद करे,

ऑफिस का काम करो मन से, न टालो जब तक टलता है.
याद रहे की इसी काम से, घर का चूल्हा जलता हैं,

आज देश को नहीं जरुरत, फांसी पर चढ़ जाने की,
देश भक्ति की यहीं हैं सूरत, नए ज़माने की,

अधिकार और कर्तव्य का ज्ञान हो सबको, न कोई कमजोर और बेचारा हो -2
 जनहित में जब कदम बढे तो, पहला कदम हमारा हो।- 3

रचयिता: रविंदर कुमार जायलवाल 
www.DharmYuddh.com.com

Monday, September 24, 2012

क-ख-ग की कविता

'क' से कोयल कूक रही, 'ख' से खरगोश खड़ा है...
'ग' से गाय रंभाती है, 'घ' से घड़ा भरा है...

'ङ' खाली से कुछ न शुरू हो, देखो, यहीं पड़ा है...

'च' से चंदा मामा चमका, 'छ' से छप्पर छाया...
'ज' से जलेबी मीठी-मीठी, 'झ' झंडा फहराया...
'ञ' खाली से भी न बने कुछ, मैं तो अब चकराया...

'ट' से लाल टमाटर खाया, 'ठ' से ठोकर खाई...
'ड' से डमरू बजता, भैया, 'ढ' ढोलक बजवाई...
'ण' से भी कुछ शुरू न होता, है अजीब यह भाई...

'त' से तीर रहे तरकश में, 'थ' से थरमस बनता...
'द' से दादा-दादी होते, 'ध' से धनुष है तनता...
जोर से बजता 'न' से नगाड़ा, बच्चा-बच्चा सुनता...

'प' से उड़ती पतंग हवा में, 'फ' से खिलते फूल...
'ब' से बकरी मैं-मैं करती, जब भी उड़ती धूल...
'भ' से भालू, 'म' से मछली, इनको भी मत भूल...

'य' से यज्ञ किया साधु ने, 'र' से रस्सी बांधी...
'ल' से लोटा होता, 'व' से वायु की चलती आंधी...

'श' से शलगम उगती है, 'ष' से षट्कोण है बनता...
'स' से सरगम बने, जो 'ह' से हारमोनियम बजता...

'क्ष' से क्षत्रिय घूमे लेकर, हाथ में 'त्र' से त्रिशूल...

'ज्ञ' से ज्ञानी जो भी पढ़ाएं, कभी न उसको भूल...

लेखक : विवेक रस्तोगी जी